गौरव को संभाव्य करो
कुछ अर्थ गहो शब्दों में अब
सब व्यर्थ नहीं ऐसा सोचो
कुछ आग भरो कंधो में अब
नमन नहीं हुंकार करो तुम
दान नहीं तुम दमन करो अब
बनता है बारूद सच शून्य ही
अपने सूक्ष्मकार से नहीं डरो अब
जब समानता मिले नहीं सहज
अंतरद्वंद्व पर संयम करो तब
क्रोध केन्द्रित करो शत्रु पर
विजय पताका हाथ धरो तब
पीताम्बर नहीं लाल रंगों मुह
विचार नहीं युद्ध करो अब
अंतिम बार अंतिम साँसों में
गौरव को संभाव्य करो अब...
- अनुभव
Labels: Hindi



0 Comments:
Post a Comment
Links to this post:
Create a Link
<< Home